मेरी सबसे लंबी रेलयात्रा (2)

Azad Hind Express

पूर्व भाग की लिंक मेरी सबसे लंबी रेल यात्रा (1)

सुबह जल्दी मेरी नींद खुली, तब घड़ी में साढ़ेपाच बज चुके थे और गाड़ी अकोला से निकल ही रही थी। उसके बाद लगभग आधे घंटे में मुर्तजापूर जंक्शन पार करते समय वहाँ कुछ दूरी पर मुझे छोटी लाईन (नैरो गेज) की रेलगाड़ी दिखाई दी। मुर्तजापूर और यवतमाल के बीच चलने वाली वह ऐतिहासिक शकुंतला एक्सप्रेस थी। कुछ समय बाद भोजन यान से नए दिन की खानपान सेवा का प्रारंभ हो गया। सबसे पहले गरमागरम चाय-कॉफी और उसके बाद नाश्ता भी लाया गया। उसी दौरान सूर्य की पहली सुनहरी किरनें खिडकी से अंदर आ रही थी।

विदर्भ से आज़ाद हिंद एक्सप्रेस गुज़र रही थी। इसके कारण ही अब कोयला ढ़ोने वाली मालगाड़ियों की यातायात बहुत बढ़ गई थी। एक के बाद एक स्टेशनों को पार करते हुए हमारी गाड़ी सुबह नौ बजकर पचास मिनट पर भारत के मध्यबिंदू पर स्थित नागपुर जंक्शन पहुँची। मैं समाचारपत्र खरीदने के लिए प्लैटफार्म पर उतरा, तब वहाँ पर बहुत चहलपहल थी। वहाँ हो रही घोषणाओं से पता चला कि, उस समय स्टेशन के सभी प्लैटफार्मों पर खड़ी रेलगाड़ियाँ भारत के हर कोने से आई हुई थी।

आधे घंटे के ठहराव के बाद नागपुर से हमारी गाड़ी आगे की यात्रा पर निकल पड़ी। नागपुर के आगे वाले मार्ग पर हम पहली बार यात्रा करने जा रहे थे। इस लिए मैंने खिड़की से बाहर बड़ी उत्सुकता से झाँकना शुरू भी कर दिया था। इस बीच नागपुर स्टेशन में स्थित भारतीय रेल प्रणाली के प्रसिद्ध डायमंड क्रासिंग को हमारी गाड़ी ने पार किया था।

मेरे पिताजी-माताजी चाय के साथ समाचारपत्र पढ़ने में व्यस्त हो गए थे और मैं खिड़की से बाहर के दृश्य देखने और डायरी में उसके बारे में नोट्स लिखने में। नागपुर के बाद पँट्री कर्मचारी ने दोपहर के खाने के आर्डर लिए। गाड़ी का भोजन यान हमारे डिब्बे के आगे ही था। उन दिनों भोजन यान में सब खाना बनाया जाता था। इसके कारण वहाँ दिए जाने वाले मसालेदार तड़के से हमें कभी-कभी छिंके भी आ रही थी। लगभग सवाबारा बजे गोंदिया जंक्शन आ गया। उसके आगेवाले गुदमा स्टेशन के पास ऐतिहासिक हावडा-मुंबई मेल और उसके पीछे-पीछे रायगढ़ से गोंदिया जा रही जनशताब्दी एक्सप्रेस क्रास हो गई। साढ़ेबारा बजे आर्डर के अनुसार दोपहर का खाना परोसा गया।

मध्यवर्ती भारत की प्राकृतिक सुंदरता अब अधिक स्पष्ट रुप से दिखाई देने लगी थी। खाना खाते-खाते मैं उस सुंदरता को भी निहार रहा था। घने जंगल, बड़े-बड़े मोड़ वाला रेलमार्ग, उस पर दौड़ रही हमारी गाड़ी, बीच-बीच में जंगल में गायब हो रही बाजू वाली लाईन - इससे यात्रा और भी सुखद और यादगार हो रही थी। हम सितंबर के अंतिम दिनों में यात्रा कर रहे थे। मान्सूनी बारीश के कारण सभी ओर हरियाली ही हरियाली फैली थी और वातावरण में नमी भी महसूस हो रही थी।

      डरेकासा स्टेशन के बाद हमारी गाड़ी ने छत्तीसगढ़ राज्य में प्रवेश किया। दोपहर में दुर्ग जंक्शन के आगे कुछ ही मिनटों में भिलाई का बड़ा स्टील प्लांट मुझे दिखाई पड़ा, जिसके बारे में मैंने पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा था। आगे रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ जैसे ठहराव लेकर आज़ाद हिंद हावडा की ओर बढ़ी। इस बीच शाम की चाय-कॉफी भी हम ले चुके थे। चंपा जंक्शन क्रास करते समय पँट्री कर्मचारी ने रात के खाने के आर्डर ले लिए। रात आठ बजे झारसुगुडा स्टेशन छोड़ा और उसके कुछ ही समय बाद रात का खाना आ गया। खाना होने के बाद यात्री सोने की तैय्यारी में जुट गए। जिन्हें इतनी जल्दी नींद नहीं आ रही थी, उनमें से कुछ ने साथ लाई हुई किताबे पढ़ना शुरू किया, तो कुछ गपशप करने में व्यस्त हो गए। ऐसा दृश्य इस लिए दिखाई दे रहा था क्योंकि, उन दिनों में किसी भी यात्री के पास मोबाईल फोन नहीं था।

आज़ाद हिंद ने देर रात राऊरकेला, चक्रधरपूर, टाटानगर, खड़गपुर में अपने नियोजित ठहराव ले लिए। राऊरकेला स्टेशन से ठीक पहले ब्राह्मणी नदी को और उसके बाद गलुडीह स्टेशन से पहले पूर्वी भारत की एक महत्वपूर्ण नदी – स्वर्णरेखा – को हमने पार किया था। अब घड़ी में सुबह के चार बज चुके थे और गहरी नींद से यात्री जागने लगे थे। हावडा स्टेशन के पहले लगभग तीन किलोमीटर तक पोरबंदर-हावडा एक्सप्रेस हमारी आज़ाद हिंद एक्सप्रेस के साथ समानांतर चल रही थी। सुबह चार बजकर 45 मिनट पर आज़ाद हिंद हावडा पहुँची और उसके साथ ही मेरे जीवन की पहली सबसे लंबी रेल यात्रा सफलतापूर्वक समाप्त हो गई।

(समाप्त)



टिप्पण्या

टिप्पणी पोस्ट करा