मेरी एक पुरानी डायरी के पन्ने पटलते-पलटते उसमें मेरे द्वारा लिखित एक रेल यात्रा का विवरण मिला। कई साल पहले मैंने पुणे से हावडा और वापसी की रेल यात्राएँ की थी। उन यात्राओं का ही वह विवरण था। वह रेल यात्रा मेरे जीवन की अब तक की सबसे लंबी रेल यात्रा रही है। मैंने आज़ाद हिंद एक्सप्रेस से वे यात्राएँ की थी। उन यात्राओं के दौरान के मेरे निरीक्षण मैंने उस डायरी में लिखे थे। उस डायरी के कारण मेरी उन यात्राओं की यादें ताजा हो गई। संयोग से वह डायरी मिलने के कुछ ही दिनों बाद आज़ाद हिंद एक्सप्रेस को शुरू होकर तीस वर्ष पूरे हो रहे थे।
भूगोल मेरा पसंदीदा विषय होने के कारण मैं हमेशा
की तरह पुणे और हावडा के बीच यात्रा करते समय बाहर के विभिन्न प्रदेशों, उनके
भौगोलिक विशिष्टताओं को उत्सुकता से देख रहा था। उस यात्रा के दौरान हमारी गाड़ी
भारत के पाँच राज्यों से होकर गुज़री। उसके साथ ही वह विभिन्न प्राकृतिक विभागों -
जैसे की दख्खन का पठार, पूर्व तटीय मैदान, छोट़ा नागपुर का पठार और गंगा के मैदान,
से होकर गुज़री। उसके साथ ही भीमा, गोदावरी, वर्धा, वैनगंगा, ब्राह्मणी, स्वर्णरेखा
जैसी महत्वपूर्ण नदियों को भी हमने पार किया। उष्ण कटिबंधीय जंगलों जैसे की -
कांटिदार, शुष्क पतझड वाले और आर्द्र जंगलों की प्राकृतिक सुंदरता को भी हमने देखा।
पुणे से कोलकाता आने-जाने के लिए उन दिनों आज़ाद हिंद एक्सप्रेस ही एकमात्र रेलगाड़ी उपलब्ध थी। जिस दिन हम इस गाड़ी से यात्रा
करने जा रहे थे, उसके दो दिन पहले ही इसकी सेवा सप्ताह में पाँच दिन से बढ़ाकर
प्रतिदिन कर दी गई थी। पुणे और हावडा के बीच की 2020 किलोमीटर की दूरी तय करने के
लिए आज़ाद हिंद एक्सप्रेस उन दिनों 34 घंटे 25 मिनट का समय लेती थी।
मैं, मेरी माँ और पिताजी के साथ कोलकाता जा रहा
था। हम सब पहली बार कोलकाता जा रहे थे। शाम ठीक छह बजकर 25 मिनट पर आज़ाद हिंद
एक्सप्रेस पुणे से रवाना हुई थी। पुणे डीज़ल लोको शेड के ‘शक्ति’ (डब्ल्युडीजी-3ए) इंजन के साथ हमारी गाड़ी चल पड़ी थी। वह इंजन पुणे से
मनमाड तक हमारी गाड़ी का कार्यअश्व रहने वाला था। गाड़ी छुटने के बाद तुरंत मैंने
मेरी डायरी में विवरण लिखना शुरु कर दिया था।
गाड़ी छुटने के बाद भोजन यान से यात्रियों के लिए
चाय, पानी और स्नैक्स लाया जाने लगा। कुछ ही मिनटों बाद खानपान सेवा का एक
कर्मचारी यात्रियों से रात के खाने के आर्डर लेने लगा। इस बीच पास वाली अप लाईन से
पुणे की ओर तेज गति से जा रही रेलगाड़ियाँ मेरा ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। उन
दिनों में पुणे और दौंड के बीच का रेलमार्ग दोहरा और गैरविद्युतीकृत था। लगभग एक
घंटा दस मिनट में ‘आज़ाद हिंद’ दौंड जंक्शन पर पहुँची। यहाँ गाड़ी के
इंजन को आगे से निकाल कर पीछे की ओर जोड़ा जाना था। जिसके कारण अब यहाँ से गाड़ी
की चलने की दिशा भी बदलने जा रही थी। उन दिनों पुणे से मनमाड और मनमाड से पुणे
जाने के लिए हर रेलगाड़ी की दिशा दौंड जंक्शन पर बदलनी पड़ती थी।
गाड़ी का इंजन दुसरी दिशा में जोड़ने की
प्रक्रिया लगभग आधे घंटे में पुरी हुई और ‘आज़ाद हिंद एक्सप्रेस’ ने रात
ठीक आठ बजकर 10 मिनट पर आगे की यात्रा शुरू की। उस समय हमेशा की तरह मैं खिड़की से
बाहर इंजन की ओर देख रहा था, तब एक बड़े घुमावदार मोड़ पर हमारी गाड़ी चल रही थी। दौंड
स्टेशन के बाहर स्थित इस बड़े मोड़ के आगे ही हमने उस यात्रा की पहली महत्वपूर्ण
नदी, भीमा नदी, को पार किया। उन दिनों दौंड़ से मनमाड तक का रेलमार्ग एकल था और उसका
विद्युतिकरण भी नहीं हुआ था।
रात के साढ़ेआठ बज चुके थे और अब पहले दी गई आर्डर
के अनुसार भोजन यान से यात्रियों को रात का खाना परोसा जाने लगा था। कुछ यात्रियों
ने अपना रात का खाना घर से ही लाया हुआ था। सबका भोजन होने तक रात के साडेनौ बज
गए। अब यात्रियों ने सोने की तैय्यारी शुरु कर दी थी। लगभग उसी समय हमारी गाड़ी ने
एक और बड़ी नदी को पार किया था। वह थी दक्षिण भारत की सबसे लंबी नदी, गोदावरी नदी।
कोपरगाव आते-आते रात के साढ़ेदस बज चुके थे और बहुत से यात्री सो भी गए थे। उन
दिनों शिर्डी तीर्थ क्षेत्र जाने के लिए सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन कोपरगाव था।
मध्यरात्रि लगभग साढ़ेबारा बजे हमारी गाड़ी मनमाड
जंक्शन पहुँची। यहाँ पर गाड़ी को डीजल इंजन की जगह डब्ल्यूएएम-4 विद्युत इंजन
जोड़ा गया। अब हावडा तक वही विद्युत इंजन ‘आज़ाद हिंद’ का कार्यअश्व बना
रहने वाला था। इस इंजन बदलने की प्रक्रिया में लगभग आधा घंटा बीत गया और उसके बाद
हमारी गाड़ी मनमाड से छुट गई। मनमाड जंक्शन से हावडा तक का पुरा मार्ग दोहरा होने
और उन दिनों इस गाड़ी के ठहराव भी कम होने के कारण अब वह अच्छी गति से दौड़ने लगी
थी।

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